अगर गावस्कर को वाडेकर बाथरूम में बंद न करते तो

हमें ऐसा लगता है कि अंधविश्वास बस गांव के लोगों में होता है. या फिर बस हमारे देश में ही होता है. लेकिन मैं आपको एक किस्सा बताता हूं. वेस्ट इंडीज़ में पनपे अंधविश्वास का. क्रिकेट के मैदान में उपजा अंधविश्वास. वेस्ट इंडीज़ के कप्तान को लगता था कि इसकी वजह से इंडिया के ख़िलाफ़ लगातार 3 टेस्ट मैचों में 3 सेंचुरी पड़ीं.

साल 1971. इंडियन टीम वेस्ट इंडीज़ के दौरे पर थी. वेस्ट इंडीज़ की कप्तानी कर रहे थे गैरी सोबर्स जो आगे चलकर सर गैरी सोबर्स हो गए. उन्होंने सुनील गावस्कर का कैच 2 बार स्लिप में छोड़ा. पहले दो टेस्ट मैचों में बल्ले से रन भी नहीं बने. उनके लिए टूर अच्छा नहीं जा रहा था. सुनील गावस्कर ने इसी टेस्ट सीरीज़ से अपना करियर शुरू किया था. पहले मैच में नहीं खेल पाए थे और दूसरे में इंडिया की जीत में उनका भी हाथ था. दिलीप सरदेसाई को जब भी मौका मिलता, टीम के नए-नवेले खिलाड़ी गावस्कर की खूब तारीफ़ करते.

इधर गैरी सोबर्स एक फ्रेंडली खिलाड़ी थे. वो हर सुबह खेल शुरू होने से पहले इंडियन ड्रेसिंग रूम में आते थे और इंडियन प्लेयर्स से बातें करते थे. उन्होंने एक रिवाज़ शुरू किया. जब वो ड्रेसिंग रूम से जाते, गावस्कर के कंधे पर हाथ रखकर जाते. तीसरे मैच की आख़िरी इनिंग्स में उन्होंने सेंचुरी मारी. उनका खेल सुधरता दिख रहा था. चौथे और पांचवे टेस्ट में भी सोबर्स ने सेंचुरी मारी. अब तक सोबर्स की इस आदत के बारे में सभी को मालूम चल चुका था.

आख़िरी दिन शुरू होने को था. सुनील गावस्कर पिछले दिन से नॉट-आउट थे. वेस्ट इंडीज़ की बैटिंग आने वाली थी. तीसरी इनिंग्स में इंडिया पहले से ही 166 रनों से पीछे चल रही थी. भारतीय कप्तान को सबसे बड़ा ख़तरा सोबर्स ही दिखाई दे रहा था. 3 सेंचुरी वो पहले ही मार चुके थे.

सुबह सोबर्स जैसे ही इंडियन ड्रेसिंग रूम में घुसे, भारतीय कप्तान ने सुनील गावस्कर की बांह पकड़ी और उन्हें उठाकर सीधे बाथरूम में बंद कर दिया. गैरी सोबर्स बहुत देर तक खिलाड़ियों से बात करते रहे और तिरछी निगाहों से गावस्कर को ढूंढते रहे. दिन के खेल शुरू होने का टाइम हो रहा था. गावस्कर को तैयार होना था लेकिन वो बाथरूम में बंद थे. उन्हें बाहर तब ही आने दिया जब गैरी सोबर्स बाहर चले गए. वो बिना गावस्कर को छुए गए. भारतीय कप्तान ने सोबर्स के टोटके को फ़ेल कर दिया था. जब सोबर्स बैटिंग करने आए, पहली ही बॉल पर आउट हो गए. आबिद अली ने उन्हें बोल्ड किया. मैच ड्रॉ हुआ और भारत ने विदेशी ज़मीन पर पहली सीरीज़ जीती. कप्तान अजीत वाडेकर की अगुवाई में. वही अजीत वाडेकर जिन्होंने सुनील गावस्कर को बाथरूम में बंद कर दिया था. वही अजीत वाडेकर जिनकी 15 अगस्त की रात 77 साल की उम्र में मौत हो गई.

1971 की इस वेस्ट इंडीज़ सीरीज़ के बाद इंडियन टीम इंग्लैंड पहुंची जहां फिर से उसे जीत मिली. इस सीरीज़ में इंडिया की परफॉरमेंस ने खुद इंडियन टीम समेत पूरी दुनिया को चौंका दिया था. टूर पर खेले गए कुल 19 फर्स्ट-क्लास मैचों में इंडिया ने 7 मैच जीते थे और सिर्फ़ 1 मैच में उसे हार मिली थी.

इस टूर पर इंडिया ने तीन टेस्ट मैचों की सीरीज़ 1-0 से जीती. लॉर्ड्स में पहला टेस्ट और ओल्ड ट्रेफर्ड में दूसरा टेस्ट ड्रॉ रहा था. तीसरे टेस्ट में इंडिया पहले इनिंग्स में भले ही 71 रनों से पीछे थी लेकिन तीसरी इनिंग्स में चंद्रशेखर ने 38 रन पर 6 विकेट लिए और इंग्लैंड 101 रनों पर आउट हो गई. जब आबिद अली विनिंग रन ले रहे थे और इंडिया इतिहास बना रही थी, उस टीम का कप्तान आर्मचेयर पे आराम से सो रहा था. ये अजीत वाडेकर ही थे जिन्हें जैसे ही ये अहसास हुआ कि टीम जीतेगी ही जीतेगी, बड़े इत्मीनान के साथ ड्रेसिंग रूम में बैठे और सो गए. जीत के जश्न का हल्ला भी मचा और उनकी नींद फिर भी नहीं टूटी. वो जागे तब जब इंग्लैंड की टीम के मैनेजर केन बैरिंगटन आए और अजीत वाडेकर को बधाई देने के लिए उन्हें हिला-डुला कर जगाया.

इसी के ठीक बाद की एक और बात जो जल्दी से बता दूं. मैच के बाद प्रेस कांफ्रेंस में नींद भरी आंखों के साथ वाडेकर पहुंचे और इधर ड्रेसिंग रूम में फ़ारुख इंजीनियर ने सारी शैम्पेन ख़त्म कर दी. जब वाडेकर वापस आए तो शैम्पेन का लुत्फ़ उठाना चाहते थे लेकिन वो ही नहीं सका. उन्हें लागर बियर से ही काम चलाना पड़ा.

अजीत वाडेकर के बचपन की बड़ी ही दिलचस्प कहानी है. बचपन, जब वो बच्चे तो नहीं थे लेकिन क्रिकेट के मैदान में पहुंचे भी नहीं थे. रुइया कॉलेज में पढ़ाई कर रहे थे. चाहते थे कि वीरमाता जीजाबाई टेक्नोलॉजिकल इंस्टिट्यूट में एडमीशन मिल जाए और इंजीनियरिंग कर सकें. रुइया में रहते हुए अजीत इतवार-इतवार टेनिस बॉल क्रिकेट खेलते थे. कुछ भी सीरियस नहीं था. जिस वक़्त वो एल्फ़िन्स्टोन कॉलेज में साइंस की पढ़ाई करते थे, बस से कॉलेज जाते थे. एक दिन बस में बैठे तो उनके बगल में उनका सीनियर आकर बैठ गया. बालू गुप्ते. गुप्ते ने वाडेकर से पूछा, “टीम में खेलोगे?” पहले तो वाडेकर ने अनमने ढंग से हां कहा लेकिन जब मालूम पड़ा कि एक मैच के लिए 3 रुपये भी मिलेंगे तो वो तुरंत राज़ी हो गए. वाडेकर को 12 वें खिलाड़ी के रूप में जगह मिल गई. बालू गुप्ते और अजीत वाडेकर आगे चलकर इंडिया के लिए खेले. मुंबई ने 1958 से लेकर 1972 तक लगातार 15 बार रणजी ट्रॉफी जीती. अजीत वाडेकर हर बार उस टीम का हिस्सा रहे.

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